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    इस साल गेम चेंजर बन सकती हैं ये 12 टेक्नॉलजीज

    वीइकल के रूप में कार का मतलब बदल देने से लेकर बीमारियों पर काबू पाने तक और कंप्यूटर्स को मनुष्यों की तरह काम करने लायक बनाने से लेकर नए मटीरियल्स की खोज तक, टेक्नॉलजी लोगों की जिंदगी बदलती रहेगी और इकनॉमिक ग्रोथ को रफ्तार भी मुहैया कराती रहेगी। हरि पुलक्कत बता रहे हैं ऐसी 12 खास टेक्नॉलजीज के बारे में, जो साल 2014 के दौरान कुछ अहम इंडस्ट्रीज के काम-काज का ढर्रा बदल सकती हैं और लॉन्ग टर्म ग्रोथ की जमीन तैयार कर सकती हैं।

    ज्यादातर इकनॉमिस्ट्स सोचते हैं कि लॉन्ग टर्म इकनॉमिक ग्रोथ के लिए टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन सबसे अहम चीज है। सोशल इंस्टिट्यूशंस की सोच और पॉलिसीज ऐसी होनी चाहिए, जिनसे ऐसे इनोवेशन को सहारा मिले। सुस्त इकनॉमिक ग्रोथ के साथ साल 2014 में कदम रखते हुए आइए उन टेक्नॉलजीज पर नजर डालें, जो दुनिया भर में तमाम अर्थव्यवस्थाओं को रफ्तार दे सकती हैं। ऐसी लिस्ट कभी भी संपूर्ण नहीं हो सकती और इस पर सवाल उठाए जा सकते हैं। हमारा मकसद संभावना और असर के लिहाज से अच्छी लिस्ट तैयार करना था। कुछ बातें तो किसी भी लिस्ट से छूट नहीं सकतीं। कुछ और ज्यादातर लिस्ट्स से बाहर ही रहेंगी। हालांकि कुछ टेक्नॉलजीज ऐसी हैं, जिनका दम-खम अभी साबित तो नहीं हो सका है, लेकिन अगर वे कामयाब हुईं, तो यकीनी तौर पर हालात बदल देंगी। तो इन सबको मिलाकर यह लिस्ट अगले एक दशक में कुछ अहम इंडस्ट्रीज की सूरत का अंदाजा दे सकती है, यानी छोटी अवधि में काम-काज में होने वाले बदलाव और लॉन्ग टर्म में ग्रोथ की पिक्चर। अपने असर के जरिए ये टेक्नॉलजीज एक और कहानी भी आपको बताती हैं। तकनीक की दुनिया के आपस में जुड़े होने की कहानी। तो देखिए कौन सी हैं ये 12 टेक्नीक...

    इन 4 पर है पुख्ता यकीन
    पहले हम 4 ऐसी टेक्नॉलजी के बारे में बता रहे हैं, जो हमारे दरवाजों पर दस्तक दे रही हैं और मार्केट में धूम मचाने को तैयार हैं। एक साथ मिलाकर इन चार तकनीक के चलते 10 से 20 लाख करोड़ डॉलर की इंडस्ट्रीज का हुलिया अगले एक दशक में बदल सकता है।

    आईटी और कंप्यूटिंग: SCAM
    आईटी इंडस्ट्री की हिस्ट्री में काम-काज का ढर्रा बदल सकने की कुव्वत रखने वाली इतनी बड़ी ताकत कभी महसूस नहीं की गई थी। यह है सोशल, क्लाउड, ऐनालिटिक्स और मोबाइल यानी SCAM की दुनिया। अलग-अलग तरह की तकनीकों की मिली-जुली ताकत। पिछले कुछ वर्षों में SCAM की अलग-अलग तकनीकों का विकास हुआ है और अब इनके कॉम्बिनेशन से बड़ा असर पड़ने वाला है। मोबाइल फोन बड़ी तादाद में बिक रहे हैं और मोबाइल नेटवर्क्स मच्योर हो गए हैं। क्लाउड कंप्यूटिंग अब एक आइडिया भर नहीं रही और ऐनालिटिक्स इन सभी को बेहतरीन ढंग से एक सूत्र में पिरोकर ताकतवर पैकेज बनाती है।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    - हॉस्पिटल्स अपने मरीजों से उनके घर में कनेक्ट होने की शुरुआत कर सकते हैं।
    - बैंक कई नई मोबाइल सेवाओं की शुरुआत कर सकते हैं।
    - रिटेलर्स SCAM का इस्तेमाल अपने स्टोर में ऑनलाइन एक्स्पीरियंस देने में कर सकते हैं।
    - कारों में आपके कंट्रोल में रहते हुए इंटेलिजेंस का पहलू जुड़ सकता है

    लाइफ साइंसेज ऐंड हेल्थकेयर: जीनोम सिक्वेंसिंग
    मानव के डीएनए की पूरी तरह से डिकोडिंग अब तक की सबसे तेजी से डिवेलप होने वाली टेक्नॉलजी रही है। यह अब बड़े पैमाने पर कमर्शल यूज के लिए तैयार है, क्योंकि लागत प्रति जीनोम कुछ हजार डॉलर के लेवल तक आ गई है। पूरे जीनोम की सिक्वेंसिंग दो हफ्तों में हो सकती है। जल्दी ही यह कई बीमारियों से बचाव और उनके इलाज का आधार बन सकती है। कैंसर के मरीजों के लिए तो यह जीवन रक्षक बन सकती है। इस तकनीक की मदद से उम्मीद है कि कैंसर रोगियों को ट्यूमर के जेनेटिक आधार पर सही दवा दी जा सकेगी। हो सकता है कि आगे चलकर जीनोम सिक्वेंसिंग नवजात बच्चों के वैक्सिनेशन जितनी आम बात हो जाए।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    - एक सप्ताह में ही पूरे जीनोम की सिक्वेंसिंग हो सकेगी।
    - जीनोम सिक्वेंसिंग की तकनीक भारत में कमर्शल बेसिस पर लॉन्च हो सकती है।
    - कैंसर के इलाज में जीनोम सिक्वेंसिंग का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हो जाए।
    - लोग यह पता लगाने के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग कराने लगें कि उन्हें किसी रोग का खतरा तो नहीं है।

    एनर्जी/ट्रांसपोर्ट : इलेक्ट्रिक कार
    टेस्ला मॉडल एस की अगुवाई में इलेक्ट्रिक कारों ने साल 2013 में अमेरिका में अच्छा सफर पूरा किया। साल 2014 में टेस्ला दूसरे देशों में भी पहुंचेगी। उम्मीद है कि होंडा, बीएमडब्ल्यू, जीएम, फोक्सवैगन जैसी दूसरी कंपनियां नए मॉडल्स लॉन्च करें। साल 2020 तक इलेक्ट्रिक कारों का मार्केट सधी रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है और उसके बाद इनका दबदबा कायम हो सकता है। साल 2014 के दौरान कुछ कारों से गियर बॉक्स की विदाई हो सकती है, बैटरियों का आकार छोटा हो सकता है और सिंगल चार्ज पर ज्यादा दूरी तक जाने की सहूलियत मिल सकती है। हो सकता है कि चार्जिंग टाइम भी कम हो जाए।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    - लिथियम ऑयन बैटरी को चुनौती देने वाली तकनीक सामने आ सकती है।
    - हो सकता है कि इलेक्ट्रिक कारें सिंगल चार्ज में 500 किलोमी़टर से ज्यादा की दूरी तय कर लें।
    - भारत में नई इलेक्ट्रिक कारों की लॉन्चिंग होगी।
    - इलेक्ट्रिक कारें अमेरिकी मार्केट में एक पर्सेंट से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल कर लेंगी।

    मैन्युफैक्चरिंग: इंटरनेट ऑफ थिंग्स यानी M2M
    मशीनों के नेटवर्क के लिए एक शब्द इस्तेमाल किया जाता है M2M। यह एक-दूसरे से जुड़े सेंसर्स और मोटर्स का एक सेट होता है। एक का काम इन्फर्मेशन देना होता है और दूसरे का उस सूचना के आधार पर काम करना। M2M को लेकर काफी उत्साह है और साल 2014 में यह हकीकत की शक्ल लेनी शुरू कर देगी। इसका सबसे ज्यादा असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में महसूस किया जाएगा। ग्लोबल सप्लाई चेंस में टाइमिंग का बेहद खास अहसास पैदा कर यह प्रॉडक्शन को बेहतर बना सकती है। यही वजह है कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स को कभी-कभार इंडस्ट्री 4.0 भी कहा जाता है।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    - SCAM का दायरा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तक फैल सकता है।
    - सस्ते माइक्रोप्रोसेसर्स तकरीबन हर चीज से जुड़ जाएं।
    - मैन्युफैक्चरिंग कंपोनेंट्स में सेंसर लगने लगें।
    - वेंडर्स एक साझा कम्यूनिकेशंस प्रोटोकॉल की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।

    दमदार संभावना
    अब हम चार ऐसी टेक्नॉलजीज के बारे में बता रहे हैं, जो कमर्शल मार्केट के लिए लगभग तैयार हैं और पूरी उम्मीद है कि साल 2014 में ये सामने आ जाएंगी।

    आईटी एंड कंप्यूटिंग: कॉग्निटिव कंप्यूटिंग
    कॉग्निटिव कंप्यूटिंग एक प्रोसेस है, जिसके जरिए कंप्यूटर्स टास्क पूरा करते हुए और मनुष्यों के साथ काम करते हुए मनुष्यों की तरह बर्ताव करना सीखते हैं। यह शब्द आईबीएम ने इससे कहीं ज्यादा पॉप्युलर शब्द आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से इसे अलग दिखाने के लिए गढ़ा था। इसके पीछे सोच यह थी कि कॉग्निटिव कंप्यूटिंग में कुछ भी आर्टिफिशल नहीं है। आईबीएम का वॉटसन सबसे अडवांस्ड कॉग्निटिव कंप्यूटिंग प्लैटफॉर्म है। कुछ और को भी डिवेलप किया जा रहा है। इसमें मुख्यत: स्टार्ट-अप्स जुटी हुई हैं। लॉन्ग टर्म में असर डाल सकने वाले कुछ कदम सामने आ सकते हैं।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    वॉटसन का इस्तेमाल कैंसर ट्रीटमेंट में ज्यादा होने लगे।
    प्राइवेट कंपनियां वॉटसन प्लैटफॉर्म पर कुछ ऐप्लिकेशंस डिवेलप करें।
    सही मायने में जो कॉग्निटिव कंप्यूटिंग हो सकती है, उससे पहले के चरण में कॉग्निटिव ऐनालिटिक्स का और विकास हो।
    स्टार्ट-अप्स कुछ प्रॉडक्ट्स पेश करें, जो मुख्यत: कॉग्निटिव ऐनालिटिक्स पर आधारित हों।

    लाइफसाइंसेज ऐंड हेल्थकेयर: पहने जा सकने वाले उपकरण
    डिवेलप्ड मार्केट्स में पर्सनल हेल्थ मॉनिटिरंग का जोर बढ़ रहा है। भारत में भी अब लोग सोने, एक्सर्साइज के असर, हार्ट की हालत, प्रेग्नेंसी आदि पर नजर रखने लगे हैं। साल 2014 में इस दिशा में अहम प्रगति हो सकती है और हो सकता है कि पहने जा सकने वाले इन उपकरणों को अस्पतालों से जोड़ा जा सके। वियरेबल डिवाइसेज नेटवर्क को इंटरनेट ऑफ थिंग्स की तरह समझा जा सकता है। इस पर भी SCAM का असर होगा। इससे और साफ होता है कि आधुनिक तकनीकों की दुनिया किस तरह एक-दूसरे को प्रभावित कर रही है। वियरेबल डिवाइसेज सेहत पर नजर रखने के लिए ही नहीं हैं। मसलन, गूगल ग्लास।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    जूनिपर रिसर्च के अनुसार, वियरेबल डिवाइसेज का मार्केट 1.5 अरब डॉलर का हो जाएगा।
    अगर इन डिवाइसेज को अस्पतालों से जोड़ दिया गया तो हेल्थकेयर में नए दौर का आगाज होगा।
    गूगल, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट और सैमसंग नॉन-मेडिकल वियरेबल डिवाइसेज लॉन्च करें।
    वियरेबल डिवाइसेज में स्मार्टफोन के कुछ फंक्शंस शामिल किए जाएं।

    एनर्जी ऐंड ट्रांसपोर्ट: न्यू बैटरीज
    रिन्यूएबल एनर्जी का सेगमेंट तभी छलांग लगाएगा, जब बैटरी के मामले में बड़ी सफलता सामने आए। दुनिया इसकी लंबे समय से प्रतीक्षा कर रही है। हमें इलेक्ट्रिक कारों के लिए बेहतर बैटरीज चाहिए, रात में बिजली के लिए सोलर फार्म्स में बैटरीज चाहिए, लगातार बिजली हासिल करने के लिए विंड फार्म्स में भी इनकी जरूरत है। कुछ ऐसी टेक्नॉलजीज हैं, जो रिन्यूएबल एनर्जी की दुनिया बदल सकती हैं। कुछ तो कमर्शलाइजेशन के मुहाने पर हैं तो कुछ अन्य अभी प्रोटोटाइप स्टेज में हैं। कुछ दूसरी महज विचार के स्तर पर हैं। हो सकता है कि इनमें से कोई खुद को सिकंदर साबित करे।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    कई तरह की बैटरीज पर काम कर रहीं 100 से ज्यादा स्टार्ट-अप्स की ओर से किसी बड़ी सफलता का ऐलान।
    MIT की स्टार्ट-अप एंब्री अपनी लिक्विड मेटल बैटरीज (इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड के लिए अहम) को बाजार में उतार सकती है।
    अमेरिकी स्टार्ट-अप इंप्रिंट एनर्जी की नॉन-टॉक्सिक, फ्लेक्सिबल, रिचार्जेबल, प्रिंटेबल जिंक बैटरीज सामने आ सकती हैं।
    लिथियम एयर बैटरी के मामले में प्रगति (इलेक्ट्रिक कारों के लिए ज्यादा रेंज) हो सकती है।

    मैन्युफैक्चरिंग: 3D प्रिंटिंग
    3D प्रिंटिंग के लिए साल 2013 दिलचस्प साल रहा। इस टेक्नॉलजी ने तेजी से पांव बढ़ाए। प्रिंटिंग के लिए गन मॉडल्स की एक लाख से ज्यादा बार डाउनलोडिंग हुई। 3D प्रिंटिंग से मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया बदल जाएगी। दुनिया भर में बड़ी कंपनियां इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने का ऐलान कर रही हैं। जो कंपनियां इस तकनीक का उपयोग कर रही हैं, उनकी आमदनी और मुनाफे में बढ़ोतरी दिख रही है। उनके शेयर ऊंचाई पर हैं। इस टेक्नॉलजी के दायरे में लाइफसाइंसेज सेक्टर भी आ रहा है। बायोटेक कंपनियां शरीर के अंगों की प्रिंटिंग पर काम कर रही हैं।

    2014 में ऐसा हो सकता है असर
    गार्टनर का कहना है कि एक लाख डॉलर से कम कीमत वाले 3D प्रिंटर्स का मार्केट 75 पर्सेंट की दर से बढ़ेगा।
    कुछ अहम पेटेंट्स की समय सीमा खत्म होने से कम लागत वाले प्रिंटर्स बाजार में आ सकते हैं।
    जीई और रॉल्स रॉयस ने तो हवाई जहाज के इंजन के पुर्जे भी इसी तकनीक से बनाने की योजना तैयार की है।
    कैलिफोर्निया की ओर्गानोव ने मनुष्य का लिवर भी प्रिंट करने का प्लान बनाया है, हालांकि इस समय इसकी कमर्शल वैल्यू नहीं दिख रही है।

    छिपे रुस्तम
    अब हम 4 ऐसी टेक्नॉलजीज के बारे में बता रहे हैं, जिनका दूरगामी असर पड़ सकता है, हालांकि कमर्शल पैमाने पर अभी इनको परखा जाना है। इनमें से कुछ साल 2014 में और आने वाले दिनों में लोगों को चौंका सकती हैं।

    आईटी एंड कंप्यूटिंग: ग्रेफीन चिप
    कॉर्बन परमाणुओं की सिंगल लेयर से ग्रेफीन बनती है। साल 2004 में इसे खोजा गया। उसके बाद से प्रयोगशालाओं में इसके कई असाधारण गुणों से परदा उठाया जा चुका है। यह आज हमारे सामने सबसे पतला और सबसे मजबूत मटीरियल है। यह गर्मी और बिजली का बेहतरीन कंडक्टर भी है। इसके ये गुण कंप्यूटिंग के लिए इसे बेहद मुफीद बनाते हैं। कंप्यूटिंग को जल्द एक बड़ी सफलता की जरूरत है क्योंकि चिप के भीतर की कॉपर वायरिंग को ज्यादा छोटा नहीं किया जा सकता है। पूरी तरह से ग्रेफीन से बनी चिप धमाका कर सकती है। MIT और IBM ने पहले ही दिखा दिया है कि यह आइडिया फोटोडिटेक्टर्स में काम कर सकता है। साल 2014 में यकीनी तौर पर इस पर नजर होगी।

    लाइफ साइंसेज एंड हेल्थकेयर: नैनोमेडिसिन
    नैनोमेडिसिन दरअसल नैनो टेक्नॉलजी के जरिए दवा का कम से कम और ज्यादा से ज्यादा प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने का मामला है। रिसर्च के मामले में यह नया एरिया नहीं है, लेकिन अभी तक नैनोमेडिसिन के लिए कमर्शलाइजेशन के लिहाज से कोई बड़ा कदम सामने नहीं आया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसा हो सकता है। बेहद सूक्ष्म कणों यानी नैनो पार्टिकल्स के जरिए दवाएं देना नैनोमेडिसिन का सबसे अहम सेगमेंट है। दवाएं देने के लिए नैनोपार्टिकल्स के इस्तेमाल पर चल रहे क्लिनिकल ट्रायल्स के कुछ अहम नतीजे साल 2014 में सामने आ सकते हैं। हो सकता है कि इनमें से कोई बड़ी खबर भारत से आए।

    एनर्जी: पेरोवस्काइट्स
    यह एक तरह का मिनरल है, जिसे कैल्शियम टाइटेनियम ऑक्साइड से बनाया गया है। इसे 19वीं सदी में खोजा गया था। सोलर सेल्स के लिए रिसर्च मटीरियल के रूप में इसकी अब पूछ बढ़ गई है क्योंकि यह सस्ता है और प्रचुर मात्रा में मिलता है। पेरोवस्काइट्स इस समय लैबरेटरीज में 15 पर्सेंट एफिशिएंसी के साथ काम कर रहे हैं। रिसर्च की रफ्तार को देखते हुए आने वाले दिनों में 25 पर्सेंट का एफिशिएंसी लेवल हासिल किया जा सकता है। हालांकि अभी इस दिशा में कुछ बैरियर्स पार किए जाने हैं। मसलन, पेरोवस्काइट्स सेल्स में सीसा होता है और अगर इसे खुले में छोड़ दिया जाए तो यह पर्यावरण में जहर घोल देता है। हालांकि साल 2014 में यह उन मटीरियल्स में होगा, जिन पर लोगों की नजर होगी।

    मैन्युफैक्चरिंग: प्रिंटेड इलेक्ट्रॉनिक्स
    यह तकनीक यकीनी तौर पर हमारी इंडस्ट्रीज का हुलिया बदल देगी। सवाल बस एक ही है कि ऐसा कब होगा। प्रिंटेड सोलर सेल्स के साथ हो सकता है कि साल 2014 में इसका आगाज हो जाए क्योंकि कई नई टेक्नॉलजीज पर साल 2013 में इस दिशा में काम हो रहा था। लागत घटते ही प्रिंटेड चिप्स हर जगह उपलब्ध हो सकेंगी, फूड पैकेट्स पर, न्यूजपेपर्स और मैगजींस पर, मैन्युफैक्चर्ड गुड्स पर भी। हो सकता है कि किसी दिन आपके न्यूजपेपर में एक विडियो हो, जो टच करने पर प्ले हो। प्रिंटेड इलेक्ट्रॉनिक्स से फूड वेस्टेज में कमी आ सकती है, सस्ती बिजली पैदा हो सकती है और हमारे शरीरों में मेडिकल डिवाइसेज को बिजली भी मिल सकती है।

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