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    इच्छामृत्य कानून :- .....तो बच जायेंगे लाखो परिवार गरीबी एवं कंगाली से।






          भारत में हर साल कैंसर से मरनेवालों की संख्या आठ लाख से ऊपर है और ये संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है।
        सिगरेट बीड़ी तम्बाखू गुटखा जैसी जहरीली नशे की आदत से मजबूर व्यक्ति तो कैंसर की चपेट में आ ही रहा है लेकिन ऐसे व्यक्तिओ की संख्या भी बढ़ी है जो कोई नशा ना करते हुए भी कैंसर की चपेट में आ रहे है। इसका मुख्य कारण है ऐसे लोगो के साथ रहने से जो धूम्रपान करते है।
         टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मुम्बई में कैंसर मरीजो की संख्या का अंदाजा आप इसी बात से लगा लीजिये कि तीन तीन महीनो से वेटिंग लिस्ट में लोग खड़े है अपनी बारी के इंतज़ार में।
       कैंसर पीड़ित व्यक्ति की एक महीने की दवा लगभग एक लाख पचीस हज़ार में आता है। एक सामान्य परिवार क्या ये खर्च उठा सकता है। नही फिर भी लोग  क़र्ज़ लेकर घर खेत बेचकर इलाज़ करवाते है जबकि उन्हें मालूम है। कि मरीज़ नही बचेगा। क्योंकि वो अपनों के दुःख नही देख सकते इस उम्मीद में अपना सब कुछ गवाँ देते है। कि हो सकता है ठीक हो जाये। वैसे भी तो छोड़ नही सकते क्योंकि वो उनके परिवार का हिस्सा है। लेकिन अगर मरीज की हालत ऐसी है कि आप कुछ भी कर लो कितना भी पैसा खर्च कर लो। पर मरीज की मौत होनी ही है देर सबेर तो ऐसे में अगर इच्छा मृत्यु कानून हमारे देश में है तो लाखो परिवार जो मरीज़ की दवा करते करते खुद कंगाली एवं गरीबी के मुहाने पर पहुँच जाते है वो बच जायेंगे। और प्रतिदिन हर पल असहनीय दर्द से तड़पते रोगी को भी ज़िन्दगी से ज्यादा मौत ही भली लगेगी।
       दुनिया भर के कई देशो में इच्छा मृत्यु कानून प्रभावी है। इसके लिए भारत जैसे देश में लोगो को खुद जागरूक होना पड़ेगा जहाँ रिश्तों की अहमियत एवं अपनों की अहमियत पैसो से ज्यादा प्रिय है।




           मेरे कहने का मतलब ये नही है की लोग पैसे खर्च होने के डर से अपने ही परिवार की जान ले ले। परंतु अगर सच्चाई को देखे तो ऐसे हज़ारो परिवार है जो अपनों को बचाने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिए और अंत में  वो तो मर जाते है लेकिन बाद में उस परिवार की माली हालात ऐसी हो जाती है। दाने दाने को मोहताज़ हो जाते है ना बच्चों को अच्छी शिच्छा दे पाते है ना ही ठीक से दो जून की रोटी का ही जुगाड़ कर पाते है। क्योंकि अपनों के इलाज़ में घर खेत तक तो बिक ही जाता है और ऊपर से जो क़र्ज़ लिए है वो कहाँ से भरे।   वैसे भी आज बहुत से ऐसे पैसे वाले एवं शिछित लोग है। जो अपने बूढ़े माँ बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आते है। जो अपने माँ बाप को अपने साथ रखकर खिला नही सकते वो दवा क्या खाक करेंगे। उनको क्या मालूम रिश्तों की अहमियत क्या होती है। माँ बाप भगवान् का रूप होते है। इस बात का एहसास उन्हें उस वक़्त होगा जब वो बूढ़े होंगे और उनके ही बच्चे उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ने जायेंगे।
           तो मेरे सभी भारतवाशी हम सबको मिलकर इस दिशा में प्रयाश करना होगा। और खुद के साथ साथ समाज को जागरूक करना होगा। और इच्छामृत्य कानून को देश में लागू करवाना होगा। जिससे हज़ारो लाखो परिवार कंगाली एवं गरीबी से बच जाये।
       आप सभी भारतवाशियों से निवेदन है कि इस लेख को ज्यादा से ज्यादा शेयर करके समाज में जागरूकता फैलाये।
                                       लेखक:- बृजेश यादव
                                 Admin:- HindiTechNews



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