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    सफलता कि राह में रोड़ा बनता खुद की सोच। कही इसके शिकार आप तो नही।






      
    हैलो दोस्तों मैं हूँ Brijesh Yadav Hindi Tech News पर आपका स्वागत है। आज का ये पोस्ट है हमारे फेसबुक मित्र श्री दिनेश कुमार गेरा जी जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी है उनके द्वारा लिखित पुस्तक " पैसो का प्रबंधन" जिसका विमोचन जनवरी 2017 में चंडीगढ़ में है। उसी पुस्तक का ये एक छोटा सा भाग है।


    कंडीशनिंग के शिकार लोग अपनी असफलता के लिए भाग्य को दोष देते है।

    संसार के अधिकांश लोग अमीरी और गरीबी को ,सफलता और असफलता को,हार और जीत को  भाग्य का खेल मानते है . वे इतने मासूम होते है कि बस छूटने से लेकर जेब कट जाने तक को किस्मत की  बात मानते है.

    क्या आपको नहीं लगता कि  बस का छूटना  टाइम का मिस मैनेजमेंट  है , जेब का कट जाना लापरवाही का नतीजा है ,असफलता अधूरे प्रयासों का परिणाम है, हारना रणनीति के अभाव का फल है ,इसी तरह से गरीबी अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह न  जानने का परिणाम है . भाग्य या किस्मत को दोष देने से आप अपनी जिम्मेदारियों  से बच भर जाते है अपनी चिंतन-प्रक्रिया को एक गलत दिशा दे कर भारमुक्त हो जाते है. 

    ये गैर जिम्मेदारी आती कहाँ से है , जो आपको अमीर बनने से , सफल व्यक्ति बनने से रोकती है  ?

    इसकी जड़े कहाँ है ,क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया ?


    सफलता के ऐन नज़दीक पहुँच कर आपका मन बदल जाता है ,आप थकान महसूस करने लगते है, पेड़ को धराशायी करने के लिए सिर्फ एक वार ही और चाहिए था और कुल्हाड़ी उस आखिरी वार से पहले छूटकर घाटी की अतल गहराइयों में समां  जाती है.क्यों होता है ऐसा ? 

    एक ही स्कूल से पढ़े-लिखे एक जैसे दिमाग वाले ,एक जैसे स्टेटस वाले दो  दोस्त जब असली ज़िन्दगी की शुरुवात करते है तो एक मीलों आगे निकल जाता है दूसरा  रास्ता कहाँ भटक गया पता ही नहीं चलता ?

    अगर बार बार ऐसा ही हो रहा है तो अपनी बचपन की यादें टटोलिये कही वहां तो असफलता के बीज नहीं बोये हुए है ,जो विशाल पेड़ बनकर आपके दिमाग में ठहर गए है .और उम्र पाकर बड़े होने पर वे अब फल देने लगे है !

    ये जान लीजिये कि भाग्य और  किस्मत सतत प्रयासों का परिणाम  है ,अगर सतत प्रयासों के बाद भी आपका भाग्य ,आपकी किस्मत आपका साथ नहीं दे रही है तो कहीं कुछ ऐसा है जिसे आप जानते नहीं है ,उसे जानिये .संभव है वो आपकी अतीत की कंडीशनिंग  हो.अगर आपकी कंडीशनिंग गलत हुई है तो उस कंडीशनिंग को जानिये,पहचानिये और वक्त रहते उस से छुटकारा पा लीजिये ;अपनी असफलता  को ,अपनी हार को अपना भाग्य न बनने दीजिये !!





    मुझे याद है मेरे पड़ोस में रहने वाले कपूर साहब के साथ एक समस्या आई थी .  उनका लड़का JUNIOR K .G . में था. अपने बेटे को  श्रीमती कपूर अल्फाबेट सिखाने लगी- जैसाकि अमूनन हर घर में किया जाता है . यहाँ तक सब ठीक था अल्फाबेट में जब Q सिखाया गया तो श्रीमती कपूर ने बच्चे को Q माने रानी सीखा दिया ( आप गौर करें Q  के साथ अल्फाबेट की बुक  में रानी  की तस्वीर  बनी होती है ) और ये सिलसिला करीबन हफ्ता भर चलता रहा 
    P  माने पैरेट, Q  माने रानी,R  माने रेट ,बच्चा दिन भर अल्फाबेट दोहराता रहता माँ उसको लाड करती रहती  . बच्चा भी खुश बच्चे की माँ भी खुश कि मेरा बेटा बड़ी तीव्र बुद्धिवाला है , संडे को मैं और कपूर साहब बाहर बैठे हुए थे ,उनका बेटा भागता दौड़ता  आता और अल्फाबेट दोहराता , अचानक कपूर साहब ने अपने बेटे को बुलाया और कहा "अंकल को अल्फाबेट  सुनाओ" . 
    बेटे को जो याद था उसने सुना दिया  P  माने पैरेट Q  माने रानी R  माने रेट.. 
    मैंने टोका "'बेटे Q  माने क्वीन "  
    "नहीं अंकल Q  माने रानी "
    आपको शायद आश्चर्य हो कपूर साहब को अपने बेटे को Q  माने रानी को भुलाने, Q  माने क्वीन समझाने,सिखाने और याद करवाने में तकरीबन चार महीने का वक्त लगा !!!
    ये रीकंडिशनिंग का प्रोसेस  है .
    एक छोटे बच्चे की कुछ दिनों की गलत कंडीशनिंग जब इतनी भारी पड़ती है ,वयस्क लोगों की कंडीशनिंग तो सालों से हो रही है -मैं ये सोचकर दशतजदा हो जाता हूँ कि इन्हे तो अपनी गलत कंडीशनिंग का पता ही नहीं है और जब इनको पता चल जायेगा उसके बाद इनकी रीकंडिशनिंग में कितना वक्त लगेगा 


    पिछले दिनों मेरे घर पर मेरा एक दोस्त आया हुआ था उसने रिस्ट वाच पहनी हुई थी , करीबन दो घंटे गप-शप   करने के बाद उठने से पहले उसने समय देखने के लिए अपने मोबाइल का इस्तेमाल किया तो मुझसे रहा नहीं गया मैंने उससे पूछा कि जब तुमने समय अपने मोबाइल से ही देखना है तो तुमने घड़ी क्यों पहनी हुई है,तुम्हारी तो घड़ी भी एक आर्डिनरी घड़ी है कोई डिज़ाइनर या एंटीक  टाइप की भी नहीं है.




    मेरा दोस्त पढ़ा लिखा है सालों से मोबाइल ( MOBILE ) इस्तेमाल कर रहा है ,मोबाइल के ढेरों फीचर्स उसकी जानकारी में है लेकिन उसने जो जवाब दिया वो  जवाब हैरान करने वाला था "क्योंकि मेरे पिताजी और दादाजी भी घड़ी पहनते थे इसलिए मैंने घड़ी पहनी हुई है !!!!  "
    कुछ लोग समय में जम जाते है ! मेरा दोस्त समय में जम गया है ,उसके दिमाग की कंडीशनिंग ऐसी हो गई है कि घड़ी का उसके लिए कोई भी व्यवहारिक उपयोग न होने के बावजूद वो घड़ी का वजन अपनी कलाई पर ढोता है .


    पैसे के कुछ सिद्धांत होते है .



    अगर कम पैसे कमाने हो तो ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है ,काम खुद करना पड़ता है ,  मेहनत  का रूप शारीरिक होता है, एवं जिम्मेदारी कम  होती है अगर ज्यादा पैसा कमाना हो तो कम मेहनत करनी पड़ती है, काम दूसरों से करवाना पड़ता है. मेहनत का रूप मानसिक होता है ,जिम्मेदारी ज्यादा होती है. 

    बहुत से लोग जो  ज्यादा पैसा कमाना चाहते है उन्हें ये बात समझ में नहीं आती कि कम मेहनत करकर भी ज्यादा पैसे कमाए जा सकते है क्योंकि उन्होंने आज तक " पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है " , "हार्ड वर्क इज की ऑफ़ सक्सेस "   जैसे वाक्य सुने है,पढ़े है . 

    मैं बहुत छोटे स्तर पर चीज़ों को लिख रहा हूँ विस्तार और सन्दर्भ स्वयं तलाश लीजियेगा .

    कृपया बताये पेमेंट काम करने पर मिलता है या काम के परिणाम पर ?




    आप को गौर से देखने पर पता चलेगा कि गरीब मानसिकता वाले लोगों के पास समय होता है लिहाजा वे अपने समय को बेचते है अपने शरीर को बेचते है यानि मज़दूरी करते है . उन्हें मजदूरी करने पर, काम करने पर, मेहनत ज्यादा करने पर  पेमेंट मिलता है .

    जबकि अमीर मानसिकता के लोगों के पास दिमाग होता है लिहाजा वे अपने दिमाग को लगाते  है यानि काम करनेवाले मजदूरों को इकट्टा करते है और उनसे काम करवाते है.चूँकि वे परिणाम (RESULT ) को बेचते है तो उन्हें परिणाम देने पर पेमेंट मिलता है .

     मज़दूर को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है उसकी मेहनत का स्वरुप शारीरिक होता है लिहाजा वो जितनी ज्यादा मेहनत करेगा उतनी ही ज्यादा बढ़ोतरी पायेगा और उसके लिए" हार्ड वर्क इज की ऑफ़ सक्सेस" एक सही मुहावरा हो जायेगा .जिसमे काम ख़राब होने पर या मुनाफा न होने पर जिम्मेदारी उसकी नहीं होगी बल्कि मालिक या ठेकेदार की होगी . उसे अपने दिए गए समय का निर्धारित मूल्य मिलेगा .

    दूसरी तरफ अमीर मानसिकता के लोगों को  पता है कि जो वस्तु ज्यादा उपलब्ध होती है उसके रेट कम होते है और जो वस्तु कम उपलब्ध होती है उसके रेट ज्यादा होते है ये मांग और आपूर्ति का मामला है .श्रम की आपूर्ति  बहुत ज्यादा है मांग से भी बहुत ज्यादा लेकिन परिणाम की आपूर्ति मांग से बहुत कम है.लिहाजा वे अपनी वित्तीय शिक्षा की बदौलत श्रम न बेचकर परिणाम  बेचते है और परिणाम बेचने के लिए मजदूरों को इकट्ठे करकर उनसे रिजल्ट लेना होता है ,वो मज़दूरों से मेहनत करवाने के लिए मैनेजर टाइप का कोई बंदा अपॉइंट  करते  है और परिणाम प्राप्त करते है . चूँकि वो खुद कुछ नहीं करते उनके  सारे काम  उनका   मैनेजर करता है लिहाजा उनके   लिए  " हार्डवर्क इज  की ऑफ़ सक्सेस "  एक गलत मुहावरा हो जायेगा .ऐसे लोगों के लिए सही मुहावरा  " स्मार्टवर्क इज  की ऑफ़ सक्सेस " होता है क्योंकि ये काम को स्मार्ट तरीके से करते है .इनकी शुरू में नेटवर्क बनाने की मेहनत ही हार्डवर्क होती है , नेटवर्क बनाने के बाद ये अपनी जिम्मेदारियाँ  दूसरों पर छोड़ते जाते है और खुद किसी अगले स्मार्टवर्क की तरफ मूव करते है .

    अगले किसी प्रोजेक्ट में मजदूरों का नेटवर्क बनाने के लिए इनका मैनेजर इनके पास रहता  है  और ये एक के बाद एक इस तरह के प्रोजेक्ट करते जाते है . अगर इस कांसेप्ट को आप बराबर समझ जाते है तो ये आपके समझ में आ जायेगा कि अमीर ज्यादा अमीर क्यों बनते जाते है .

    वैसे भी कहावत है आपको पहला लाख बनाने में टाइम,मेहनत,दिमाग लगाना पड़ता है फिर अगला लाख बनाने में वक्त नहीं लगता क्योंकि तब आपको  लाख बनाने का फार्मूला पता हो जाता है .





     अमूनन लोग समस्या का एक हिस्सा देखते है वो हिस्सा खुद में ही एक समस्या होता है ,उस समस्या का एक व्यवहारिक हल तलाशना और उसका व्यावसायिक उपयोग कर पाना पैसा पैदा करता है यानी समस्याओं को हल करने से पैसा मिलता है .अगर समस्या छोटे स्तर पर हल की जाती है तो कम पैसे मिलते हैं  और बड़े स्तर पर हल की जाती है तो भरपूर पैसे मिलते हैं  .
    ध्यान देवे गरीब मानसिकता हमेशा समस्याओं का रोना रोती रहती है 
    और
    अमीर मानसिकता समस्या का व्यवहारिक हल देखकर उसका व्यावसायिक उपयोग करती है .
    यानि अमीर समस्या से बड़े होते है और गरीब समस्या से छोटे ,अमीर समस्या निवारक होते है और गरीब समस्या के उपभोक्ता. 
    आइये इसे एक कहानी  से समझे .
    एक देहात में कई   किसान रहते थे ,सारे  ही परेशान थे कि चूहे उनके गोदाम में पड़ा हुआ अनाज खा जाते थे .
    रामप्रसाद नामक किसान अपने किसी शहरी रिश्तेदार से इसकी चर्चा करता है जो कि पढ़ा -लिखा है और उसकी सलाह से पिंजरों  का इस्तेमाल करता है  और अपने गोदाम में पड़े अनाज को चूहों से बचाता है .
    बाकी किसान परेशान है चूहों से .
    रामप्रसाद इस समस्या को एक अवसर की तरह इस्तेमाल करता है शहर जाता है और वहां से पिंजरे बनवा कर अपने देहात में लाकर अच्छे-खासे  मुनाफे के साथ बेच देता है  .




    रामप्रसाद और बाकी किसानो में फर्क क्या है ,ये सोचे-समझे .

    हकीकत में समस्या नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं है !!!
    एक परिस्थिति जो आपके कम्फर्ट जोन के बाहर होती है  उसे आप समस्या मान लेते है जबकि वो समस्या नहीं एक परिस्थिति है .


    पैसे के लिए बुराई की जड़,हाथ का मैल,पाप की कमाई जैसे विशेषणों का इस्तेमाल करने वाले  शख्स से पैसे के बारे में बात करना एक तकलीफदेह अनुभव होता है . ऐसे शख्स को  पैसे की बुनियादी समझ नहीं होती है सो  पैसा इनके  लिए मज़ाक की बात होती है या फिर ये  लोग अपनी असफलता को जायज ठहराने के लिए कुतर्कों का सहारा लेते है लिहाजा ये  पैसे को ही नाजायज ठहरा देते है  , हकीकत में ये  अपनी खिसियाहट छुपा रहे होते है. हकीकत में ये अपनी अधूरी जानकारी और समझ को लेकर ज़िन्दगी की कठिन डगर को और कठिन बना रहे है ऐसे लोग खुद के साथ-साथ अपने परिवार और रिश्तेदारों  के लिए  भी खतरनाक होते है . गाहे-बगाहे ये अपनी सोच को अन्य लोगो पर भी थोपने का प्रयास करते रहते है ! 
               ऐसे शख्स अगर आपके साथी है तो बेहतर है इनकी पैसे को लेकर नकारात्मक धारणाओं को आप अनसुना कर देवे ,ये खुद भीड़-भाड़ वाले रास्ते पर है और आपको भी उसी रास्ते पर चलाना चाह रहे है जो कतई  उचित नहीं है !!
                                     साभार:-  पैसो का प्रबंधन (पुस्तक)
                                    लेखक: -   दिनेश कुमार गेरा



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