कोरिया का सम्पूर्ण इतिहास (भाग 1) - 1895–1897: साम्राज्य बनने से पहले की सबसे बड़ी राजनीतिक साज़िश

यह कहानी केवल कोरिया की नहीं, बल्कि जापान, चीन और रूस के बीच एशिया पर प्रभुत्व की लड़ाई की भी है। 1895–1897 का समय आधुनिक कोरिया के इतिहास ...


यह कहानी केवल कोरिया की नहीं, बल्कि जापान, चीन और रूस के बीच एशिया पर प्रभुत्व की लड़ाई की भी है। 1895–1897 का समय आधुनिक कोरिया के इतिहास का सबसे निर्णायक दौर माना जाता है। यदि इन दो वर्षों की घटनाएँ अलग होतीं, तो शायद आज उत्तर और दक्षिण कोरिया का इतिहास भी अलग होता।


अध्याय 1: 1895 से पहले का कोरिया

1895 से पहले कोरिया का आधिकारिक नाम जोसोन साम्राज्य (Joseon Kingdom) था।

  • स्थापना: 1392

  • राजधानी: हानसियोंग (आज का सियोल)

  • शासक: यी (Yi) राजवंश

  • शासन अवधि: लगभग 500 वर्ष

हालाँकि जोसोन एक स्वतंत्र राज्य था, लेकिन सदियों तक उसने चीन के मिंग और बाद में चिंग साम्राज्य के साथ श्रद्धांजलि (Tributary) संबंध बनाए रखे। इसका अर्थ यह नहीं था कि चीन सीधे कोरिया पर शासन करता था, बल्कि चीन क्षेत्र की प्रमुख शक्ति था और कोरिया उसके साथ विशेष राजनयिक संबंध रखता था।


अध्याय 2: एशिया में शक्ति संतुलन बदलना

19वीं शताब्दी के अंत तक एशिया में बड़ा बदलाव शुरू हो चुका था।

जापान

1868 की मेइजी पुनर्स्थापना (Meiji Restoration) के बाद जापान ने तेज़ी से आधुनिकीकरण किया।

  • आधुनिक सेना

  • आधुनिक नौसेना

  • उद्योग

  • रेलवे

  • शिक्षा

कुछ ही दशकों में जापान एशिया की सबसे तेज़ी से उभरती सैन्य शक्ति बन गया।


चीन

चिंग साम्राज्य कई समस्याओं से जूझ रहा था।

  • भ्रष्टाचार

  • विदेशी दबाव

  • आर्थिक कमजोरी

  • आंतरिक विद्रोह


रूस

रूस साइबेरिया से आगे बढ़ते हुए प्रशांत महासागर तक पहुँचना चाहता था।

उसे एक ऐसा बंदरगाह चाहिए था जो पूरे वर्ष बर्फ़ से मुक्त रहे।

इस कारण रूस की नज़र कोरिया और मंचूरिया पर थी।


पश्चिमी देश

  • ब्रिटेन

  • अमेरिका

  • फ्रांस

  • जर्मनी

सभी एशिया में व्यापार और प्रभाव बढ़ाना चाहते थे।

इस प्रकार कोरिया चार बड़ी शक्तियों के बीच फँस गया।


अध्याय 3: पहला चीन–जापान युद्ध (1894–1895)

युद्ध का मुख्य कारण कोरिया पर प्रभाव था।

दोनों देश चाहते थे कि कोरिया उनके प्रभाव क्षेत्र में रहे।

युद्ध के प्रमुख मोर्चे:

  • कोरिया

  • मंचूरिया

  • पीला सागर (Yellow Sea)


जापान की ऐतिहासिक जीत

यह युद्ध दुनिया के लिए चौंकाने वाला था।

एक आधुनिक बन चुका जापान, विशाल लेकिन कमजोर चिंग चीन को हरा देता है।

1895 में शिमोनोसेकी संधि (Treaty of Shimonoseki) हुई।

इसके परिणाम:

  • चीन ने कोरिया पर अपने विशेष प्रभाव का दावा छोड़ दिया।

  • जापान की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

  • कोरिया औपचारिक रूप से अधिक स्वतंत्र दिखने लगा, लेकिन वास्तव में जापानी प्रभाव तेज़ी से बढ़ा।


अध्याय 4: महारानी म्योंगसोंग (Queen Min)

कोरिया की महारानी म्योंगसोंग (जिन्हें पहले "क्वीन मिन" कहा जाता था) अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व थीं।

उनकी सोच थी:

"यदि जापान बहुत शक्तिशाली हो रहा है, तो हमें रूस और अन्य देशों से संबंध मजबूत करने चाहिए।"

यही बात जापान को स्वीकार नहीं थी।


अध्याय 5: जापान की गुप्त योजना

जापान को डर था कि यदि रूस कोरिया में प्रभाव बढ़ा लेगा, तो उसकी एशियाई रणनीति कमजोर पड़ जाएगी।

इसलिए जापानी अधिकारियों ने तय किया कि महारानी को सत्ता से हटाना होगा।

योजना गुप्त रखी गई।


अध्याय 6: 8 अक्टूबर 1895 – महल पर हमला

सुबह-सुबह जापानी एजेंट और उनके समर्थक सैनिक ग्योंगबोकगुंग महल (Gyeongbokgung Palace) में घुस गए।

उन्होंने:

  • महल के पहरेदारों को परास्त किया।

  • महारानी की तलाश शुरू की।

  • कई महिलाओं से पूछताछ की क्योंकि वे पहचान छिपाने की कोशिश कर रही थीं।

आख़िरकार महारानी म्योंगसोंग को खोज लिया गया।


अध्याय 7: महारानी की हत्या

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार:

  • महारानी की हत्या महल के भीतर की गई।

  • बाद में उनके शव को महल के पास ले जाकर जला दिया गया ताकि सबूत मिटाए जा सकें।

इस घटना ने पूरे कोरिया को झकझोर दिया।

आज भी इसे कोरियाई इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जाता है।


अध्याय 8: जनता की प्रतिक्रिया

पूरे देश में गहरा आक्रोश फैल गया।

कई लोगों ने:

  • जापानी वस्तुओं का विरोध किया।

  • स्थानीय प्रतिरोध समूह बनाए।

  • राजा के समर्थन में आवाज़ उठाई।

यहीं से संगठित राष्ट्रवादी भावना और मजबूत होने लगी।


अध्याय 9: राजा गोजोंग का भय

महारानी की हत्या के बाद राजा गोजोंग को लगा कि वे भी निशाने पर हो सकते हैं।

महल अब सुरक्षित नहीं था।

उनके सलाहकारों ने सुझाव दिया कि वे जापानी नियंत्रण से बाहर किसी सुरक्षित स्थान पर जाएँ।


अध्याय 10: रूसी दूतावास में शरण (1896)

फरवरी 1896 में राजा गोजोंग और युवराज गुप्त रूप से महल छोड़कर रूसी दूतावास पहुँच गए।

इस घटना को इतिहास में Agwan Pacheon कहा जाता है।

लगभग एक वर्ष तक उन्होंने वहीं से शासन किया।

इस दौरान:

  • जापान का प्रभाव कुछ समय के लिए कम हुआ।

  • रूस का प्रभाव बढ़ गया।

  • विदेशी शक्तियाँ कोरिया की राजनीति में और गहराई से शामिल हो गईं।


अध्याय 11: रूस बनाम जापान

अब स्थिति बदल चुकी थी।

पहले जापान का दबदबा बढ़ रहा था।

अब रूस भी खुलकर कोरिया के मामलों में प्रभाव स्थापित करने लगा।

दोनों शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज़ हो गई।

यही प्रतिस्पर्धा आगे चलकर रूस-जापान युद्ध (1904–1905) का प्रमुख कारण बनी।


अध्याय 12: गोजोंग की नई सोच

रूसी दूतावास में रहते हुए गोजोंग ने महसूस किया कि:

  • केवल "राज्य (Kingdom)" बने रहना पर्याप्त नहीं है।

  • दुनिया को यह दिखाना होगा कि कोरिया किसी भी साम्राज्य से कम नहीं।

इसी सोच से उन्होंने एक नई योजना बनाई।


अध्याय 13: 1897 की तैयारी

गोजोंग ने राजधानी लौटने की तैयारी शुरू की।

उन्होंने तय किया कि:

  • कोरिया को आधुनिक बनाया जाएगा।

  • प्रशासन में सुधार होगा।

  • सेना को आधुनिक बनाया जाएगा।

  • विदेशी शक्तियों को दिखाया जाएगा कि कोरिया एक संप्रभु राष्ट्र है।

इसी तैयारी ने अगले वर्ष एक ऐतिहासिक घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया।


भाग 1 का निष्कर्ष

1895–1897 के केवल दो वर्षों में:

  • चीन का प्रभाव कम हुआ।

  • जापान का प्रभाव तेज़ी से बढ़ा।

  • रूस एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरा।

  • महारानी म्योंगसोंग की हत्या हुई।

  • राजा गोजोंग ने रूसी दूतावास में शरण ली।

  • कोरिया ने अपने राजनीतिक भविष्य पर पुनर्विचार शुरू किया।

  • Empire of Korea की नींव रखी गई।


अगले भाग (1897–1904) में

हम विस्तार से जानेंगे:

  • Empire of Korea की आधिकारिक स्थापना

  • Emperor Gojong का राज्याभिषेक

  • Daehan Empire नाम क्यों चुना गया?

  • Gwangmu Reforms (आधुनिकीकरण)

  • रेलवे, बिजली, टेलीफोन और आधुनिक सेना

  • जापान और रूस के बीच बढ़ता तनाव

  • कोरिया के आधुनिकीकरण की पूरी कहानी

यह भाग बताएगा कि कोरिया ने स्वयं को एक आधुनिक साम्राज्य बनाने की कोशिश कैसे की और क्यों वह अंततः जापान के बढ़ते दबाव का सामना नहीं कर सका।

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