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    विजय मर्चेन्ट : - 15 वर्ष की उम्र में दोनों पारियों में जड़े थे शतक।







    12 अक्टूबर, 1911 को बंबई (अब मुंबई) में जन्मा दाएं हाथ का यह 
    बल्लेबाज अपने 18 साल के करियर में सिर्फ 10 टेस्ट मैच ही खेल पाया, जिसमें उन्होंने तीन शतक और तीन अर्धशतक की मदद से 47.72 की औसत के साथ 859 रन बनाए। लेकिन प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने अपनी क्षमता का असली परिचय देते हुए 71.64 की बेजोड़ औसत के साथ 150 मैचों में 13470 रन बनाए, जिसमें 45 शतक और 52 अर्धशतक शामिल हैं। उन्होंने इसके अलावा अपनी मध्यम तेज गति की गेंदबाजी से 32.12 की औसत से 65 विकेट भी चटकाए।
    बंबई के एक संपन्न परिवार में जन्में विजय ने कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही मात्र 15 बरस की उम्र में दोनों पारियों में शतक जड़कर लोगों को अपनी बल्लेबाजी का कायल बना दिया था। बेहतरीन फुटवर्क के साथ बल्लेबाजी करने वाले विजय को कट, ड्राइव, ग्लान्स और लेट कट खेलने में महारथ हासिल थी जबकि बाद में उन्होंने हुक शॉट को भी अपने हथियारों में शामिल कर लिया।


    खिलाड़ी के अलावा प्रशासक, लेखक और टेस्ट चयनकर्ता के रूप में भी अपनी छाप छोड़ने वाले मर्चेन्ट का 27 अक्टूबर 1987 को 76 बरस की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
    विजय ने बंबई में होने वाले टूर्नामेंटों में 1929 से 1946 तक हिन्दूज टीम का प्रतिनिधित्व किया जबकि 1933 के बाद वह बंबई की रणजी टीम का हिस्सा रहे। वर्ष 1952 में क्रिकेट को अलविदा कहने वाले इस बल्लेबाज ने 44 प्रथम श्रेणी शतक के दौरान 11 बार दोहरा शतक जमाया।




    उन्होंने ब्रेबोर्न स्टेडियम में ही नौ दोहरे शतक जमाए जिसमें महाराष्ट्र के खिलाफ 1943-44 में खेली गई नाबाद 359 रन की पारी भी शामिल है। इतना ही नहीं उन्होंने 1938-39 और 1941-42 के बीच सात रणजी पारियों में छह शतक भी मारे।
       
    विजय को 1933-34 में इंग्लैंड के खिलाफ भारतीय सरजमीं पर टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला लेकिन दाएं हाथ का यह बल्लेबाज अधिक सफल नहीं रहा और छह पारियों में उनका सर्वाधिक स्कोर 54 रन का रहा। 1936 में विजय इंग्लैंड के दौरे पर गए और 51.32 की औसत से 1745 रन जुटाकर चोटी पर रहे। वह लंकाशर के खिलाफ ओल्ड ट्रैफर्ड में दोनों पारियों में 135 और 77 रन बनाकर नाबाद रहे। इस दौरे पर बेहतरीन सफलता के लिए उन्हें विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर भी चुना गया।
    उनकी सफलता से इंग्लैंड के क्रिकेटर सीबी फ्राई इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा,"चलिए उसे (विजय) सफेद रंग से पेंट कर देते हैं और अपने साथ ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सलामी बल्लेबाज बनाकर ले जाते हैं।"

    विजय ने दो बार इंग्लैंड का दौरा किया और इस दौरान उन्होंने 4000 से अधिक रन बनाए। उन्होंने अपने सभी टेस्ट भी इंग्लैंड के ही खिलाफ खेले। 1946 के दौरे में टीम के उपकप्तान के रूप में गए बंबई के इस बल्लेबाज ने 74 की औसत से सात शतक की मदद से 2385 रन बटोरकर अपने कौशल का परिचय दिया। उन्होंने इस दौरे पर तीन टेस्ट की पांच पारियों में 245 रन बनाए, जिसमें ओवल में खेली 128 रन की पारी भी शामिल है।
        
    खराब स्वास्थ के कारण ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज के दौरे पर नहीं जा सके विजय ने इसके बाद 1951-52 में इंग्लैंड के खिलाफ दिल्ली में एक और टेस्ट खेला और अपना सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाते हुए 154 रन की पारी खेली। उन्होंने इस दौरान अपने चिर प्रतिद्वंद्वी और कप्तान विजय हजारे के साथ तीसरे विकेट के लिए 211 रन की साझेदारी की। हालांकि इसी मैच में क्षेत्ररक्षण के दौरान चोटिल होने पर उन्हें 40 बरस के अपने क्रिकेट करियर को अलविदा कहना पड़ा।



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