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    सायना नेहवाल :- सुबह 4 बजे उठकर 25 किलोमीटर जाती थी बैडमिंटन सीखने। जानें कैसे पहुची सफलता के शिखर पर।


    17 मार्च 1990 को हिसार हरयाणा में जन्मी नेहवाल का अधिकांश समय हैदराबाद में गुजरा है. सायना नेहवाल की बैडमिंटन के प्रति रूचि का श्रेय उनके माता पिता को जाता है. सायना के पिता डा. हरवीर सिंह जो तिलहन अनुसंधान निदेशालय हैदराबाद में वैज्ञानिक हैं और माता उषा नेहवाल हरियाणा के पूर्व बैडमिंटन चैंपियन रह चुके थे अतः बेटी की इस खेल के प्रति दिलचस्पी स्वभाविक थी.
    आठ वर्ष कि उम्र में सायना नेहवाल के पिता सायना को बैडमिंटन कोच नानी प्रसाद के पास लाल बहादुर स्टेडियम ले गए जहाँ सायना की प्रतिभा देख प्रसाद ने सायना नेहवाल को अपनी संरक्षण में ले लिया. शुरुआती दिनों में नेहवाल को बैडमिंटन का ऐसा चस्का लगा कि वह सुबह चार बजे उठकर 25 किलोमीटर बैडमिंटन सीखने जाती थीं. सायना नेहवाल की इस खेल के प्रति रूचि देख उनके माता-पिता भी बहुत प्रभावित हुए अतः सायना नेहवाल की कोचिंग फीस को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने बचत और भविष्य निधि खातों से भी पैसे खर्च करना शुरू कर दिया. 2002 में खेल ब्रांड योनेक्स ने सायना के किट को प्रायोजित किया. वर्ष 2004 में बीपीसीएल ने सायना को अपने पेरोल पर रखा और बाद में सन 2005 में जब सायना की ख्याति बढ़ने लगी तो मित्तल चैंपियंस ट्रस्ट ने उनकी सभी सुविधओं का ज़िम्मा ले लिया.
    नेहवाल का बैडमिंटन कैरियर
    अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सायना नेहवाल की शुरुआत 2006 में हुई. उस वर्ष नेहवाल ने 4-स्टार ख़िताब, फिलीपींस ओपन जीता और इस वर्ष नेहवाल ने कई उलटफेर भी किए. 2006 में अपने अच्छे प्रदर्शन के द्वारा सायना नेहवाल के गिनती विश्व की उभरती हुई प्रतिभाओं में होने लगी.
    सायना नेहवाल पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं जिसने ओलंपिक में बैडमिंटन के एकल मुकाबलों में क्वार्टर फाइनल तक का सफ़र तय किया था और जिसने विश्व जूनियर बैडमिंटन चैंपियनशिप में ख़िताब जीता था. 21 जून 2009 में सायना नेहवाल ने इतिहास रचते हुए सुपर सीरीज टूर्नामेंट जीता था. सायना नेहवाल के कोच अतीक जौहरी का मानना है कि सायना नेहवाल एक दिन विश्व की चोटी की खिलाड़ी होंगी. सायना नेहवाल के बैडमिंटन कॅरियर पर पूर्व आल इंग्लैंड बैडमिंटन चैम्पियन भारत के पुलेला गोपीचंद की छाप बहुत गहरी है. सायना नेहवाल भी उन्हें गुरु की तरह मानती है.
    आशाओं का सागर
    सायना नेहवाल का 2010 वर्ष बहुत अच्छा बीता है. अभी तक उन्होंने दो विश्वस्तरीय प्रतियोगिता जीत विश्व रैकिंग में तीसरा पायदान हासिल कर लिया है इसके अलावा वह मौजूदा राष्ट्रीय चैंपियन भी हैं.
    प्रतिभा, हौसले और ज़ज्बे की धनी सायना नेहवाल भारत की कोहिनूर हैं जिसकी ख्याति दिनप्रतिदिन चारों दिशाओं में फ़ैल रही है. 20 वर्ष की छोटी सी उम्र में नेहवाल ने हमको गर्व करने के बहुत से मौके दिए हैं. उनकी उपलब्धियां उनकी सफलता का गुणगान करती हैं. परन्तु क्या हमने और हमारे देशवासियों ने सायना नेहवाल को सही तवज्जो दिया है. कहीं दूसरे खिलाड़ियों की तरह यह कोहिनूर भी चुरा न लिया जाए अतः इसके लिए ज़रूरी है कि हम सायना नेहवाल का साथ हर कदम पर दें क्योंकि यह कोहिनूर ही हमारे देश की शान बढ़ाएगा.
    भारतीय बैडमिंटन सनसनी
    हर युवा की तरह उभरती हुई बैडमिंटन खि‍लाड़ी सायना नेहवाल ने भी कुछ सपने देखे और आज वे धीरे-धीरे उन्‍हें हकीकत में बदल रही हैं। आज सायना वि‍श्व की पाँचवे नंबर की बैडमिंटन खि‍लाड़ी हैं। दो साल पहले उन्‍होंने खुद को वि‍श्व के शीर्ष 10 खि‍लाड़ि‍यों में देखने का लक्ष्‍य रखा था और आज वो वि‍श्व के शीर्ष पाँच खि‍लाड़ि‍यों में शामि‍ल हैं। 17 मार्च 1990 को हि‍सार, हरि‍याणा में जन्‍मी सायना आज बैडमिंटन की नई सनसनी हैं। 8 साल की उम्र में बैडमिंटन रैकेट थाम चुकी सायना आज विश्व रैंकिंग में पाँचवे स्थान पर पहुँच गई हैं। सायना ने शुरुआती प्रशि‍क्षण हैदराबाद के लाल बहादुर स्‍टेडि‍यम में कोच नानी प्रसाद से प्राप्त कि‍या। माता-पि‍ता दोनो के बैडमिंटन खि‍लाड़ी होने के कारण सायना का बैडमिंटन की ओर रुझान शुरु से ही था। पि‍ता हरवीर सिंह ने बेटी की रुचि‍ को देखते हुए उसे पुरा सहयोग और प्रोत्‍साहन दि‍या।
    सायना अब तक कई बड़ी उपलब्धियाँ अपने नाम कर चुकी हैं। वे विश्व जूनियर बैडमिंटन चैंपियन रह चुकी हैं। ओलिम्पिक खेलों में महिला एकल बैडमिंटन के क्वार्टरफाइनल तक पहुँचने वाली वे देश की पहली महिला खिलाड़ी हैं। उन्‍होंने 2006 में एशि‍यन सैटलाइट चैंपि‍यनशि‍प भी जीती है। उन्होंने 2009 में इंडोनेशिया ओपन जीतते हुए सुपर सीरिज बैडमिंटन टूर्नामेंट का खिताब अपने नाम किया, यह उपलब्धि उनसे पहले किसी अन्य भारतीय महिला को हासिल नहीं हुई। भारत में यूँ तो खेलों में क्रिकेटरों की पूछपरक ज्यादा है, लेकिन आईपीएल की डेक्कन चार्जर्स टीम ने अपना ब्रांड एम्बेसेडर सायना को बनाया है। सायना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उनके कारण देश में बैडमिंटन का खेल लोकप्रियता पा रहा है। इस लड़की को देखकर कई माता-पिता अपनी बेटियों को भी भविष्य की साइना बनाने का सपना देखने लगे हैं।
    सायना उन तमाम लड़कियों के लिए भी एक आदर्श बनकर उभरी हैं जो कुछ कर दिखाने का जज्बा रखती हैं और आगे बढ़ना चाहती हैं। महिला सशक्तिकरण में उनका अप्रत्यक्ष योगदान है। मीडिया की चकाचौध और बयानबाजी से दूर रहते हुए देश में महिलाओं के विकास में सायना का यह योगदान अतुलनीय और अनुकरणीय है। उम्मीद है कि सायना का यह सफर सफलता की और भी इबारते लिखेगा और उन्हें देखकर देश की कई लड़कियाँ भी आगे आएँगीं। भारतिया महिला स्पोर्ट्स मे सायना एस एक बड़ा आदर्श हैं।

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