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    निवेशक ने जकरबर्ग से कहा था- फेसबुक तुम्हें वह पहचान देगा, जो करोड़ों डॉलर भी न दे पाएं







    मार्क जकरबर्ग का नाम दुनिया जानती है। लेकिन मार्क एंड्रीसन का नाम आम लोगों के लिए उतना ही अनजान है। दरअसल एंड्रीसन वह निवेशक हैं, जिन्होंने काफी पहले फेसबुक की बड़ी कामयाबी को भांप लिया था। इसीलिए उन्होंने 2006 में जकरबर्ग को याहू के साथ साढ़े चार हजार करोड़ रु. से ज्यादा की डील तोड़ने के लिए राजी किया था। 2008 से वे फेसबुक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हैं।

    दुनिया के सबसे कामयाब निवेशकों की फोर्ब्स मिडास-100 लिस्ट में एंड्रीसन 19वें स्थान पर हैं। हाल ही में 'द न्यू यॉर्कर' मैगजीन को दिए इंटरव्यू में एंड्रीसन ने बताया वो वाक्या, जब हर शख्स कह रहा था- 'जकरबर्ग बेच दो फेसबुक'। पढ़िए वो कहानी...





    मैंने जकरबर्ग से कहा- फेसबुक तुम्हें वह पहचान देगा, जो करोड़ों डॉलर भी न दे पाएं

    ये जुलाई 2006 की बात है, फेसबुक को आए हुए दो साल ही हुए थे। पर यह अमेरिका की दूसरी बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट बन चुकी थी। हम इसमें पैसा लगाने वाले दूसरी बड़ी फर्म थे। अचानक एक खबर आई, फेसबुक को याहू 4,427 करोड़ रुपए कैश देकर खरीदना चाहती है। फेसबुक के दफ्तर में खुशी की लहर दौड़ गई। हमारे सबसे बड़े निवेशक एस्सल पार्टनर्स भी खुश थे। लेकिन जकरबर्ग दिल से खुश नहीं थे, वे कंफ्यूजन में थे। क्या करें, क्या न करें?




    वैसे तो 22 साल के लड़के के लिहाज से देखें तो यह बड़ा मौका था। सिर्फ दो साल पुरानी कंपनी को याहू इतना बड़ा ऑफर दे रही थी। पर मुझे लगा कि यह डील एक बड़ी कामयाबी का सफर खत्म कर देगी। उस वक्त जकरबर्ग इतने दबाव में थे कि कुछ तय करने की स्थिति में ही नहीं थे। फेसबुक में हर शख्स एक ही बात कर रहा था 'बेच दो-बेच दो'। अच्छा मौका है। तब मैंने जकरबर्ग से कहा 'मत बेचना, क्योंकि जहां तुम फेसबुक को ले जा सकते हो और जहां तक फेसबुक जा सकती है, वो पहचान शायद बिलियन डॉलर कभी न दे पाए।'

    ऑफिस से लेकर समुद्र किनारे की सैर तक हमारी इस बारे में खूब लंबी चर्चाएं हुईं। इस दौरान हमारा रिश्ता इंवेस्टर-क्लाइंट के बजाए दोस्त का बन चुका था। आखिरकार जकरबर्ग ने याहू का ऑफर ठुकरा ही दिया और आज यह कंपनी 12.83 लाख करोड़ रुपए (200 अरब डॉलर) से कहीं ज्यादा की है।'





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